(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.271. अध्यायः 271
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति हिंसात्यागपूर्वकं शरीराविरोधेन धर्माचरणचोदना॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

`युधिष्ठिर उवाच। 12-271-0x(6303)(76096)
शरीरमापदश्चैव न विदन्त्यविहिंसकाः।
कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यते॥ 12-271-1(76097)
भीष्म उवाच। 12-271-2x(6304)
यथा शरीरं न म्लायेन्नैव मृत्युवशं भवेत्।
तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत्॥' 12-271-2(76098)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
प्रजानामनुकम्पार्थं गीतं राज्ञा विचख्युना॥ 12-271-3(76099)
छिन्नस्थूणं वृपं दृष्ट्वा विरावं च गवां भृशम्।
गोगृहे यज्ञवाटे च प्रेक्षमाणः स पार्थिवः॥ 12-271-4(76100)
स्वस्ति गोभ्योऽस्तु लोकेषु ततो निर्वचनं कृतम्।
हिंसायां हि प्रवृत्तायामाशीरेषा तु कल्पिता॥ 12-271-5(76101)
अव्यवस्थितमर्यादैर्विमूढैर्नास्तिकैर्नरैः।
संशयात्मभिरव्यक्तैर्हिंसा समनुदर्शिता॥ 12-271-6(76102)
सर्वकर्मग्वहिंसां हि धर्मात्मा मनुरब्रवीत्।
कामकाराद्विहिंसन्ति बहिर्वेद्यां पशून्नराः॥ 12-271-7(76103)
तस्मात्प्रमाणतः कार्यो धर्मः सूक्ष्मो विजानता।
अहिंसा ह्येव सर्वेभ्यो धर्मेभ्यो ज्यायसी मता॥ 12-271-8(76104)
उपोष्य संशितो भूत्वा हित्वा वेदकृतां शुचिः।
आचार इत्यनाचारः कृपणाः फलहेतवः॥ 12-271-9(76105)
यदि च्छिन्दन्ति वृक्षांश्च यूपांश्चोद्दिश्य मानवाः।
वृथा मांसानि खादन्ति नैप धर्मः प्रशस्यते॥ 12-271-10(76106)
सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवं कृसरौदनम्।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद्वेदेषु कल्पितम्।
कामान्मोहाच्च लोभाच्च लौल्यमेतत्प्रवर्तितम्॥ 12-271-11(76107)
विष्णुमेवाभिजानन्ति सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणाः।
पायसैः सुमनोभिश्च तस्यैव यजनं स्मृतम्॥ 12-271-12(76108)
यज्ञियाश्चैव ये वृक्षा वेदेषु परिकल्पिताः।
यच्चापि किंचित्कर्तव्यमन्यच्चोक्षैः सुसंस्कृतम्।
महासत्वैः शुद्धभावैः सर्वं देवार्हमेव तत्॥ 12-271-13(76109)
युधिष्ठिर उवाच। 12-271-14x(6305)
शरीरमापदश्चापि विवदन्त्यविहंसतः।
कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यते॥ 12-271-14(76110)
भीष्म उवाच। 12-271-15x(6306)
यथा शरीरं न ग्लायेन्नेयान्मृत्युवशं यथा।
तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत्॥ ॥ 12-271-15(76111)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 271॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-271-4 छिन्ना विशस्ता स्थूणा प्रतिमा शरीरं यस्य तम्॥ 12-271-5 निश्चितं वचनं निर्वचनम्। एषा स्वस्ति गोभ्योऽस्त्विति हिंसा कतौ पश्वालम्भः॥ 12-271-9 वेदकृतां वेदोक्तां हिंसाम्। आचार इति बुद्ध्या अनाचारः आचरणहीनः॥ 12-271-12 विष्णुमेव यजन्तीहेति ट. थ. पाठः॥ 12-271-13 चोक्षैर्विशुद्धैः॥ 12-271-14 आपदः शरीरं शोपयन्ति शरीरं चापदां नाशमिच्छत्यतोऽत्यन्तं हिंसाशून्यस्य कथं शरीरनिर्वाह इत्याह शरीरमिति॥


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